Sunday, 14 December 2014

 Change your self first
सिकंदर के राज्य में किसी लुटेरे का बहुत आतंक हो गया। यह शातिर
लुटेरा अपना काम अत्यंत चतुराई से करता और किसी की पकड़ में नहीं आता।
सिकंदर ने पूरी सैन्य शक्ति उसे पकड़ने में लगा दी। कई महीनों के परिश्रम के
बाद आखिर एक दिन लुटेरा पकड़ा गया। जब सिपाही उसे सिकंदर के सामने लाए तो
सिकंदर ने देखा कि उसके चेहरे पर भय का कोई नामो-निशान नहीं है। सिकंदर
उसके साहस को देखकर चकित भी हुआ और सम्राट होने के अहंकार के कारण थोड़ा
क्रोध भी आया, क्योंकि उसे अपने सामने खड़े लोगों के चेहरों पर भययुक्त
विनम्रता देखने की आदत थी। उसने लुटेरे से कहा, ‘यदि तुम अपने अपराधों के
लिए क्षमा मांग लो, तो तुम्हें छोड़ दिया जाएगा, अन्यथा तुम्हें निरपराध
लोगों को लूटने का दंड दिया जाएगा।’
लुटेरे ने जवाब दिया, ‘मुझे मृत्यु का भय नहीं है, क्योंकि जो पैदा
हुआ है वह एक न एक दिन जरूर मरेगा, किंतु एक लुटेरा दूसरे लुटेरे को क्षमा
नहीं कर सकता।’ सिकंदर ने चकित होकर पूछा, ‘क्या मैं लुटेरा हूं?’ लुटेरे
ने कहा, ‘बेशक आप लुटेरे हैं। यदि मैंने इंसानों को लूटा है तो आपने
राज्यों को लूटा है। जो काम मैंने छोटे पैमाने पर किया, वही आपने बड़े
पैमाने पर किया है। अंतर सिर्फ इतना है कि आप स्वतंत्र हैं और मैं आपका
कैदी।’ लुटेरे के सटीक उत्तर ने सिकंदर को मौन कर दिया और उसने लुटेरे को
रिहा कर दिया। किसी गलत बात का प्रतिकार करने का नैतिक अधिकार तभी प्राप्त
होता है, जब हमारा स्वयं का आचरण उससे मुक्त हो। सत्ताधीशों पर तो इस
सिद्धांत को और अधिक कड़ाई से लागू करना चाहिए, क्योंकि वे एक बड़े जनसमूह के
नेता होते हैं और उन्हें प्रेरणास्रोत के रूप में प्रतिष्ठा दी जाती है।

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